हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इतिहास के पन्नों पर एक बार फिर यह सच्चाई दर्ज हो गई कि ताकत के नशे में चूर शासक हमेशा विजयी नहीं होते। कभी-कभी घमंड का महल अपने ही बोझ से ढह जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को झुकाने, उसकी संप्रभुता मिटाने और उसके संकल्प को तोड़ने के लिए युद्ध का रास्ता अपनाया, लेकिन नतीजा इसके विपरीत निकला।
ईरान पर हमले हुए, उसकी धरती खून से रंग गई और रहबर-ए-इंकलाब आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई शहीद हो गए, लेकिन उनके खून ने प्रतिरोध की मशाल बुझाने के बजाय उसे और अधिक रौशन कर दिया।
एक ओर युद्ध के मैदान में ईरान के प्रतिरोध ने दुनिया को हैरान किया, तो दूसरी ओर अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में ट्रंप की पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। 3 नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों का नियंत्रण खो बैठी। इस तरह युद्ध का प्रभाव राजनीतिक मैदान तक पहुंच गया और ट्रंप को अपनी नीतियों का राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा।
यह शहीद ख़ामेनेई के खून की लालिमा है या इतिहास के माथे पर सत्य का प्रकाश! यह किसी एक व्यक्तित्व की शहादत नहीं, बल्कि एक विचारधारा की बुलंदी है। यह केवल एक शरीर का खून नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के संकल्प का लहू है। जब शहीद का खून जमीन पर गिरता है, तो वह असत्य और अन्याय के महलों में भूकंप पैदा कर देता है।
ट्रंप ने समझा था कि बमों की गर्जना से आवाजें खामोश हो जाएंगी और मिसाइलों की बारिश से इरादे चकनाचूर हो जाएंगे, लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि शहादतें आंदोलनों को मिटाती नहीं हैं, बल्कि उन्हें अमर जीवन प्रदान करती हैं।
इतिहास का फैसला हमेशा यही रहा है कि सिंहासन और ताज अस्थायी होते हैं, लेकिन सत्य का ध्वज हमेशा कायम रहता है। सत्ता की चमक कुछ दिनों की होती है, मगर शहीद का खून हमेशा अमर रहता है।
आज दुनिया देख रही है कि अहंकार को पराजय, दृढ़ता को सम्मान और अत्याचार को बदनामी मिलती है। ट्रंप की राजनीतिक हार हो या ईरान का रक्षात्मक पलटवार, इसका मूल संदेश यही है:
असत्य के पास बारूद था, सत्य के पास ईमान था;
असत्य के पास ताकत थी, सत्य के पास शहीद का लहू था!
और जब शहीद का लहू बोलता है, तो इतिहास के गलियारों में केवल एक ही आवाज गूंजती है:
असत्य मिट जाता है, लेकिन सत्य हमेशा बाकी रहता है!
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